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भावार्थ


निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है] क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।


विभिन्न प्रकार की कलाएँ] असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान सभी देशों से जरूर लेने चाहिये] परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।

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